18 टांकों में सिल गया सिस्टम का चेहरा: मकराना की मासूम फ़ाईजा पूछ रही है — “क्या सड़कों पर अब इंसानों का हक नहीं रहा?”

तीन दिन पहले सांड ने सींगों पर उठाकर पटक दिया, आज भी दर्दभरी आंख से सिस्टम के लिए सवाल बह रहे हैं

मकराना शहर में आवारा सांडों, निराश्रित गोवंश और आवारा कुत्तों का आतंक अब सिर्फ “समस्या” नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनहीनता का जीवित प्रमाण बन चुका है। इसका सबसे दर्दनाक उदाहरण है वार्ड नंबर 44 स्थित ठाकुर साहब की आखली, मानधानिया की छतरियों के पास रहने वाली 11 वर्षीय मासूम फ़ाईजा।

करीब डेढ़ साल पहले पिता मोहम्मद शकील का निधन हो चुका है। पिता के साए के बिना जिंदगी गुजार रही फ़ाईजा अपने चाचा गुलाम मोहम्मद के पास रहती है। परिवार पहले से आर्थिक तंगी से जूझ रहा था, लेकिन अब एक आवारा सांड ने इस परिवार की मुश्किलों को और गहरा कर दिया।

“सांड” मकराना की सड़कों का नया मालिक?

तीन दिन पहले फ़ाईजा अपने चाचा के लड़के भाई के साथ बाइक पर घर लौट रही थी। घर से कुछ ही दूरी पर गली में अचानक एक आवारा सांड ने दोनों पर हमला कर दिया। बताया जा रहा है कि सांड ने फ़ाईजा को सींगों पर उठाकर जोर से पटक दिया। इस हमले में बच्ची की आंख और सिर के आसपास गंभीर चोटें आईं।
घायल हालत में परिजन दोनों भाई-बहन को अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां चिकित्सकों ने फ़ाईजा के चेहरे और आंख के आसपास 18 टांके लगाए। हादसे के बाद लगातार दो दिन तक उसकी आंख से खून बहता रहा। आज भी आंख के आसपास भारी सूजन है , आंख अभी तक नहीं खुल पाई है और बच्ची ठीक से बोल तक नहीं पा रही।
लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह हादसा हुआ कैसे? और उससे बड़ा सवाल — क्या मकराना में ऐसे हादसे अब “सामान्य” मान लिए गए हैं?

वातानुकूलित कमरों में बैठा सिस्टम शायद ये दर्द नहीं देख पाता

मकराना की सड़कों पर घूमते सांड, चौक-चौराहों पर बैठे निराश्रित गोवंश और झुंड बनाकर घूमते आवारा कुत्ते अब लोगों की जान के लिए खतरा बन चुके हैं। हर गली में डर है, हर सड़क पर खतरा है, लेकिन जिम्मेदारों के पास शायद समय नहीं है।
शहर के लोग तंज कसते हुए कहते हैं कि अधिकारियों को शायद यह सब दिखाई नहीं देता, क्योंकि उनकी गाड़ियाँ सीधे दफ्तर से घर और घर से मीटिंग तक ही चलती हैं। जनता की गलियों में उतरकर दर्द देखने का समय किसके पास है?

जनप्रतिनिधियों के भाषणों में “विकास” दौड़ता है, मगर मकराना की सड़कों पर आज भी सांड दौड़ रहे हैं — और उनके सींगों पर आम आदमी की सुरक्षा टंगी हुई है।

हादसे के बाद जागता है प्रशासन, फिर सो जाता है

मकराना में यह पहला मामला नहीं है। पहले भी कई लोग आवारा पशुओं और कुत्तों के हमलों का शिकार हो चुके हैं। हर बार कुछ दिन चर्चा होती है, कुछ फोटो खिंचते हैं, कुछ आश्वासन दिए जाते हैं और फिर पूरा सिस्टम गहरी नींद में चला जाता है।

आखिर कब तक शहर के बच्चे सांडों के सींगों पर उछाले जाते रहेंगे? कब तक गरीब परिवार इलाज और डर के बीच पिसते रहेंगे?

गरीब चाचा पर इलाज का बोझ, मदद की अपील

फ़ाईजा के चाचा गुलाम मोहम्मद की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर है। बच्ची के इलाज का खर्च उठाना परिवार के लिए मुश्किल होता जा रहा है। ऐसे में चाहे अधिकारी और जनप्रतिनिधि इस दर्द को महसूस करें या नहीं, समाज को आगे आना होगा।

मानवता के नाते आमजन से अपील है कि मासूम फ़ाईजा के इलाज में परिवार की मदद करें और सहयोग का हाथ बढ़ाएं। क्योंकि शायद मकराना में अब इंसान ही इंसान के काम आ सकता है… सिस्टम तो फिलहाल फाइलों में व्यस्त दिखाई देता है और जनप्रतिनिधियों को अपनी पार्टी के कार्यकमों से फुर्सत नहीं मिल रही। नीचे दिए गए QR कोड फ़ाईजा की माताजी गुल अफ़्शा के एकाउंट के है । आप इस कोड को स्कैन करके, जितना आप कर सके , मासूम फ़ाईजा की मदद कर सकते हैं ।

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