कुचामन सिटी के बूडसू रोड निवासी शेख वसीम के आठ वर्षीय सुपुत्र शेख असद ने इस वर्ष क्लास 5 के बोर्ड एग्जाम के साथ बुधवार को सातवें रोजे के दिन अपने जीवन का पहला रोज़ा रखकर एक प्रेरणादायक मिसाल पेश की है। छोटी उम्र, परीक्षा का दबाव और रोज़े की जिम्मेदारी—इन सबके बावजूद असद ने हिम्मत, सब्र और लगन का बेहतरीन परिचय दिया।
रमज़ान के सातवें रोजे के दिन बुधवार को असद ने सुबह जल्दी उठकर घरवालों के साथ सहरी की और रोजे की शुरुआत की । इसके बाद असद अपनी पढ़ाई में जुट गए । परिवार के अनुसार, परीक्षा की तैयारी और रोज़े की हालत में भी असद ने अपने हौसले को कम नहीं होने दिया। स्कूल के बोर्ड एग्जाम की तैयारी के साथ-साथ नमाज़ और दुआ का एहतमाम भी जारी रखा।

इफ्तार के वक्त घर में खास रौनक देखने को मिली। जैसे ही इफ्तार का वक्त हुआ , असद ने खजूर और पानी से अपना पहला रोज़ा खोला। परिवार के सदस्यों ने उन्हें गले लगाकर मुबारकबाद दी,माला पहनाई और उनके उज्ज्वल भविष्य के लिए दुआ की।
असद के दादा शेख अल्लाह बंदा जी ने बताया कि असद शुरू से ही पढ़ाई में होनहार रहा है और दीन के प्रति भी समर्पित है। उन्होंने कहा, “आज के दौर में बच्चों का पढ़ाई और दीन दोनों में संतुलन बनाकर चलना बहुत बड़ी बात है। असद ने हमें फख्र महसूस कराया है। हम दुआ करते हैं कि वह तालीम और अख़लाक दोनों में आगे बढ़े।”

पिता शेख वसीम ने कहा कि उन्होंने बेटे पर कभी ज़बरदस्ती नहीं की, बल्कि प्यार और समझाइश के साथ रोज़े की अहमियत बताई। “असद ने खुद शौक़ से पहला रोज़ा रखने की इच्छा जताई। बोर्ड एग्जाम के बावजूद उसका जज़्बा कम नहीं हुआ।
