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डीडवाना-कुचामन जिले का छोटा सा गांव खुनखुना इन दिनों एक बड़े संदेश की वजह से चर्चा में है। ऐसे समय में, जब देशभर में धर्म और पहचान के नाम पर खींची जा रही लकीरें अक्सर खबरों की सुर्खियां बनती हैं, वहीं इस गांव ने चुपचाप एक ऐसी कहानी लिख दी, जो दिलों को जोड़ने वाली है, तोड़ने वाली नहीं।
यहां मुस्लिम समाज के लोगों ने न सिर्फ एक हिंदू परिवार के सुख-दुख में भागीदारी निभाई, बल्कि ‘मायरा’ जैसी परंपरा को निभाकर रिश्तों को और भी गहरा बना दिया।

युसूफ खान, इक़बाल खान और AVVNL से जुड़े भंवरू खान गरदेजी ने बहन राधा देवी और चुन्नीलाल लुहार के वैवाहिक कार्यक्रम में चुनरी के साथ 35 हजार रुपये का मायरा भरा। इसके साथ ही जमाल खान, रहमान खान गरदेजी, इमरान मुराद और मोहियूद्दीन खान ने 5100 रुपये की भेंट देकर इस परंपरा को और सम्मान दिया।

नागौर और डीडवाना कुचामन जिले में मायरा केवल एक रस्म नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और रिश्तों की गहराई का प्रतीक माना जाता है। यहां पहले भी कई चर्चित मायरे सामने आए हैं, जहां समाज, जाति और धर्म की सीमाएं पीछे छूट जाती हैं और इंसानियत सबसे आगे खड़ी नजर आती है। खुनखुना का यह मायरा उसी परंपरा की एक मजबूत कड़ी बनकर उभरा है।

इस पूरे घटनाक्रम की खास बात यह रही कि इसमें कहीं दिखावा नहीं था, न ही कोई औपचारिकता—बस दिल से जुड़ा एक रिश्ता था, जिसे निभाने के लिए लोग आगे आए। यही तो है गंगा-जमुनी तहज़ीब, जहां अलग-अलग धर्मों के लोग एक-दूसरे के त्योहार, परंपराएं और भावनाएं अपने मानकर निभाते हैं।

आज जब छोटी-छोटी बातों पर समाज में दूरियां बढ़ जाती हैं, ऐसे में खुनखुना गांव का यह उदाहरण एक आईना है—जो दिखाता है कि अगर नीयत साफ हो और दिल बड़ा हो, तो हर दीवार अपने आप गिर जाती है।
यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं, बल्कि उस भारत की है, जहां अब भी मोहब्बत जिंदा है… और जहां मायरा सिर्फ पैसे का नहीं, बल्कि रिश्तों और भरोसे का होता है।
