कुचामन कोर्ट का बड़ा आदेश: चितावा थाना पुलिस पर दर्ज होगी एफआईआर
एसीजेएम बोले- अधीनस्थों को बचाने के उद्देश्य से पेश की गई प्रतीत होती है जांच रिपोर्ट
कुचामन सिटी। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (एसीजेएम) कुचामन सिटी ने चितावा थाने से जुड़े एक प्रकरण में महत्वपूर्ण आदेश पारित करते हुए थानाधिकारी सहित परिवाद में नामजद पुलिसकर्मियों एवं अन्य आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट पर गंभीर सवाल उठाते हुए टिप्पणी की कि रिपोर्ट बिना साक्ष्यिक पुष्टि के पेश की गई है तथा प्रथम दृष्टया यह अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को बचाने के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई प्रतीत होती है।

मामले की सुनवाई के दौरान परिवादी विजय कुमार मेघवाल अपने अधिवक्ता तेजपाल पुरी के साथ न्यायालय में उपस्थित हुए। न्यायालय के समक्ष पुलिस की तथ्यात्मक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की गई। परिवादी की मौखिक परीक्षा तथा परिवाद में अंकित तथ्यों, मेडिकल रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों के अवलोकन के बाद अदालत ने माना कि उपलब्ध सामग्री से प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध घटित होना परिलक्षित होता है, जिसके संबंध में विधिसम्मत अनुसंधान आवश्यक एवं न्यायोचित है।
आदेश में न्यायालय ने उल्लेख किया कि मामला स्वयं पुलिस थाने के अधिकारियों एवं कर्मचारियों पर लगाए गए आरोपों से संबंधित है। पुलिस की ओर से पेश तथ्यात्मक रिपोर्ट में कहा गया था कि परिवादी एवं अन्य पक्ष के बीच रुपये के लेन-देन को लेकर विवाद हुआ था तथा परिवादी के विरुद्ध दर्ज प्रकरण संख्या 166/2025 में “नतीजा अदम वकू झूठ” दिया गया था। रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि परिवादी को थाने में अभद्र व्यवहार करने पर बीएनएसएस की धारा 126 एवं 170 के तहत गिरफ्तार कर निरोधात्मक कार्रवाई की गई थी तथा परिवाद में लगाए गए आरोप निराधार पाए गए।

हालांकि न्यायालय ने रिपोर्ट की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाते हुए कहा कि जांच रिपोर्ट के साथ किसी भी गवाह के बयान संलग्न नहीं किए गए हैं। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट नहीं होता कि रिपोर्ट किन साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर तैयार की गई। अदालत ने यह भी पाया कि घटना से संबंधित सीसीटीवी फुटेज की पेन ड्राइव के संबंध में थानाधिकारी को बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद फुटेज के स्थानांतरण और उसकी बिना किसी कट-छांट के रिकॉर्डिंग होने संबंधी निर्धारित प्रारूप का कोई प्रमाण-पत्र न्यायालय में प्रस्तुत नहीं किया गया।
न्यायालय ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि संबंधित प्रकरण में पुलिस अधीक्षक स्तर से कई बार तथ्यात्मक रिपोर्ट तलब किए जाने के बावजूद रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे मामला जानबूझकर विलंबित किए जाने का प्रयास प्रतीत होता है।

एसीजेएम ने अपने आदेश में स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा कि वृत्ताधिकारी द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट बिना किसी साक्ष्यिक संपुष्टि के पेश की गई है। संबंधित थाने पर अधिकारिता रखने के कारण अधीनस्थ कर्मचारियों को बचाने की मंशा से रिपोर्ट प्रस्तुत किया जाना भी प्रकट होता है।

इन परिस्थितियों को देखते हुए न्यायालय ने परिवाद एवं संलग्न दस्तावेज पुलिस थाना कुचामन को भेजते हुए आदेश दिया कि परिवादी के बयान दर्ज कर जिन धाराओं में अपराध बनना प्रकट होता हो, उनमें प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज की जाए तथा आवश्यक अनुसंधान कर यथाशीघ्र नतीजा रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत की जाए।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चूंकि संबंधित वृत्ताधिकारी की रिपोर्ट पहले ही संदिग्ध पाई गई है, इसलिए पुनः उसी वृत्त के किसी पुलिस अधिकारी को अनुसंधान सौंपे जाने पर पूर्वाग्रह अथवा पूर्व में प्रस्तुत रिपोर्ट के दबाव में जांच किए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे में मामले का अनुसंधान पुलिस अधीक्षक डीडवाना-कुचामन के निर्देशानुसार किसी स्वतंत्र पुलिस अधिकारी से करवाया जाना सुनिश्चित किया जाए।

न्यायालय ने पुलिस अधीक्षक डीडवाना-कुचामन को पूरे प्रकरण के अनुसंधान की समुचित मॉनिटरिंग सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं। साथ ही परिवादी द्वारा प्रस्तुत परिवाद, मेडिकल रिपोर्ट तथा वृत्ताधिकारी कुचामन सिटी द्वारा पेश जांच रिपोर्ट को अभिलेख पर रखते हुए मामले को अनुसंधान हेतु भिजवा दिया गया है।
अदालत ने मामले में अनुसंधान पूर्ण कर 10 सितंबर 2026 तक नतीजा रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने के आदेश दिए हैं।
