बांगड़ अस्पताल में नवजात शिशुओं को जीवनदान देने का प्रशिक्षण, एनआरपी कार्यशाला में डॉक्टरों-स्टाफ ने सीखी जीवनरक्षक तकनीक


डीडवाना। राजकीय बांगड़ जिला चिकित्सालय में रविवार को नवजात शिशुओं को नया जीवन देने वाली “नियोनेटल रिससिटेशन प्रोसीजर” (एनआरपी) पर एक दिवसीय विशेष प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित की गई। कार्यशाला का उद्देश्य जन्म के समय सांस नहीं ले पाने वाले नवजात शिशुओं को त्वरित और वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित करने की तकनीकों का प्रशिक्षण देना रहा।


नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम द्वारा हर वर्ष 10 मई को एनआरपी दिवस मनाया जाता है। इसी क्रम में देशभर में लगभग एक हजार स्थानों पर विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं, जिनमें सरकारी और निजी क्षेत्र के करीब 20 हजार से अधिक चिकित्सक एवं चिकित्सा कर्मी भाग लेकर कौशल आधारित प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं।


देशव्यापी अभियान के तहत डीडवाना में भी आयोजन


कार्यक्रम के समन्वयक वरिष्ठ शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सी. पी. नागौरा ने बताया कि नेशनल नियोनेटोलॉजी फोरम के अध्यक्ष डॉ. एल. के. भारती के नेतृत्व में यह प्रशिक्षण देशभर के साथ डीडवाना में भी आयोजित किया गया। उन्होंने कहा कि भारत में नवजात शिशु मृत्यु एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती है, जिसकी बड़ी वजह जन्म के समय शिशु की सांस शुरू नहीं होना है।
उन्होंने बताया कि शिशु के जन्म के तुरंत बाद के शुरुआती कुछ मिनट बेहद महत्वपूर्ण होते हैं। यदि उस समय प्रशिक्षित चिकित्सक और स्टाफ उपलब्ध हों तो सरल वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के माध्यम से नवजात को पुनर्जीवित कर उसकी जान बचाई जा सकती है।


माँ सरस्वती के पूजन से हुआ शुभारंभ


कार्यशाला का शुभारंभ प्रमुख चिकित्सा अधिकारी (PMO) डॉ. अजीत सिंह शेखावत एवं डॉ. सुरेश नेतड़ ने माँ सरस्वती की प्रतिमा के समक्ष दीप प्रज्वलित कर किया।
इस अवसर पर डॉ. अजीत सिंह शेखावत ने कहा कि जन्म के तुरंत बाद सांस नहीं ले पाने वाले नवजात शिशुओं के लिए एनआरपी तकनीक अत्यंत जीवनरक्षक साबित होती है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक स्वास्थ्यकर्मी को इस प्रक्रिया में दक्ष होना आवश्यक है ताकि आपात स्थिति में समय रहते शिशु का जीवन बचाया जा सके।


डॉ. सी. पी. नागौरा ने दिया तकनीकी एवं प्रायोगिक प्रशिक्षण


मुख्य प्रशिक्षक डॉ. सी. पी. नागौरा ने उपस्थित चिकित्सकों एवं चिकित्सा कर्मियों को नवजात शिशुओं की सांस बहाल करने की वैज्ञानिक प्रक्रिया की विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने डमी (मैनिकन) के माध्यम से प्रैक्टिकल प्रशिक्षण देते हुए बताया कि जन्म के “गोल्डन मिनट” यानी पहले एक मिनट में सही दबाव एवं वेंटिलेशन तकनीक अपनाकर नवजात शिशु की जान बचाई जा सकती है।


उन्होंने प्रशिक्षणार्थियों को आपातकालीन परिस्थितियों में त्वरित निर्णय लेने, उपकरणों के सही उपयोग तथा आवश्यक दवाओं एवं उपचार पद्धतियों के बारे में भी विस्तार से जानकारी दी।


चिकित्सा कर्मियों ने लिया प्रशिक्षण


कार्यशाला में स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. अरविन्दर चौधरी, डॉ. पूनम सोमरा, नर्सिंग ऑफिसर लक्ष्मण भाटी, नीतू चौधरी, सुनीता बोला, सुनीता पूनिया, माया कुमावत, मंजू महला, सुमित्रा ढाका, सुमन चौधरी सहित लेबर रूम टीम एवं पीडियाट्रिक विभाग के कर्मियों ने भाग लिया।
सभी प्रतिभागियों को नवजात पुनर्जीवन से संबंधित उपकरणों की कार्यप्रणाली का अभ्यास कराया गया तथा आवश्यक सूचना पत्रक भी वितरित किए गए।


ये रहे उपस्थित


प्रशिक्षण के उद्घाटन सत्र में नर्सिंग अधीक्षक गणेशराम चौधरी, तकनीकी सहायक अमरीश माथुर, दिलीप सेन, खुशबू पंवार सहित अस्पताल के विभिन्न विभागों के कर्मचारी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के अंत में आयोजकों द्वारा सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया गया। प्रमुख चिकित्सा अधिकारी डॉ. अजीत सिंह शेखावत ने प्रशिक्षणार्थियों को प्रमाण पत्र वितरित कर उनका उत्साहवर्धन किया।

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