दीपावली पर डीडवाना की अनूठी परंपरा: रूप चतुर्दशी की रात बाजारों में उतरती है महिलाओं की कला, मांडणों से सजती हैं दुकानें

सदियों से चली आ रही परंपरा में आस्था, संस्कृति और महिला सशक्तिकरण का संगम, सास से बहू और मां से बेटियों तक पहुंच रही मांडणे बनाने की कला

डीडवाना। राजस्थान के डीडवाना में दीपावली का त्योहार एक अनूठी परंपरा के कारण खास पहचान रखता है। यहां रूप चतुर्दशी की रात महिलाएं और युवतियां सज-संवरकर बाजारों में पहुंचती हैं और अपने परिवार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के सामने पारंपरिक मांडणे बनाती हैं। रंग-बिरंगी आकृतियों, स्वास्तिक और मां लक्ष्मी के चरणों से सजे ये मांडणे न केवल बाजारों की रौनक बढ़ाते हैं, बल्कि आस्था, पारिवारिक विरासत और महिला सहभागिता की एक अनूठी कहानी भी बयां करते हैं।
बताया जाता है कि यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। इसकी खासियत यह है कि महिलाएं घरों के आंगन तक सीमित रहने के बजाय बाजारों में आकर अपने परिवार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को सजाती हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार, इन मांडणों के जरिए मां लक्ष्मी का स्वागत किया जाता है और कारोबार में सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।

बाजारों में उमड़ती है शहरवासियों की भीड़

आमतौर पर घरों के आंगन और चौखट पर बनाए जाने वाले मांडणे यहां बाजारों में दुकानों के सामने नजर आते हैं। महिलाओं की इस कला को देखने के लिए शहरवासी भी बड़ी संख्या में बाजारों में पहुंचते हैं। खरीदारी के साथ-साथ लोग अलग-अलग दुकानों पर बनाए गए मांडणों की खूबसूरती को निहारते हैं।
मांडणा बनाने वाली सुनयना मोर और युवती भाग्यश्री के अनुसार, यह परंपरा उनके लिए केवल एक रस्म नहीं, बल्कि दीपावली के सबसे खास अवसरों में से एक है। महिलाएं पूरे उत्साह और लगन के साथ अपने प्रतिष्ठानों पर मांडणे बनाती हैं और इस परंपरा से जुड़कर गर्व महसूस करती हैं।

पीढ़ियों से आगे बढ़ रही परंपरा, सास-बहू और मां-बेटियों का जुड़ाव

मांडणे तैयार होने के बाद परिवार की बड़ी महिलाएं उन्हें शगुन देकर आशीर्वाद देती हैं। महिलाओं के लिए यह अवसर अपनी पारंपरिक कला दिखाने के साथ परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने का भी माध्यम है।
मांडणा बनाने वाली पूर्णिमा सोनी और सुमन अग्रवाल के मुताबिक, दीपावली के इस खास दिन का उन्हें पूरे साल इंतजार रहता है। वे अपने प्रतिष्ठानों पर आकर्षक मांडणे बनाने के लिए पहले से तैयारी करती हैं। इस दौरान महिलाओं में एक-दूसरे से बेहतर और खूबसूरत मांडणे बनाने का उत्साह भी देखने को मिलता है।

महिला सशक्तिकरण और बराबरी का संदेश भी देती है परंपरा

डीडवाना की इस परंपरा का एक सामाजिक पहलू भी है। स्थानीय स्तर पर प्रचलित मान्यता के अनुसार, पुराने समय में जब महिलाओं के लिए घर से बाहर निकलकर सार्वजनिक गतिविधियों में भाग लेना आसान नहीं था, उस दौर में बाजारों में महिलाओं के मांडणे बनाने की परंपरा ने उन्हें सार्वजनिक रूप से अपनी कला और प्रतिभा प्रदर्शित करने का अवसर दिया।


डीडवाना नगर परिषद के उप सभापति हरीश मोदी के अनुसार, इस परंपरा को महिला सशक्तिकरण और महिलाओं को पुरुषों के बराबर भागीदारी देने के संदेश से भी जोड़कर देखा जाता है। उनके मुताबिक, रूप चतुर्दशी की रात बाजारों में महिलाओं का उत्साह देखते ही बनता है। नगर परिषद की ओर से आकर्षक मांडणे बनाने वाली महिलाओं को पुरस्कार देकर प्रोत्साहित भी किया जाता है।
इससे महिलाओं के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा मिलता है और पारंपरिक मांडणा कला को भी संरक्षण मिलता है।

डीडवाना की सांस्कृतिक पहचान बन चुकी है यह परंपरा

यहां बनने वाला हर मांडणा केवल रंगों और आकृतियों का मेल नहीं, बल्कि महिलाओं की मेहनत, रचनात्मकता, पारिवारिक परंपराओं और धार्मिक आस्था की कहानी भी बयां करता है।
दीपावली पर रोशनी और सजावट तो हर शहर में होती है, लेकिन रूप चतुर्दशी की रात डीडवाना के बाजारों में महिलाओं के हाथों से बनने वाले मांडणे इस शहर की दिवाली को एक अलग पहचान देते हैं। यह परंपरा बताती है कि संस्कृति की असली खूबसूरती उसकी विरासत को संभालकर रखने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में है।

आज के आधुनिक दौर में जहां कई पारंपरिक कलाएं धीरे-धीरे अपनी पहचान खो रही हैं, वहीं डीडवाना की महिलाएं इस विरासत को पूरी शिद्दत से अगली पीढ़ी तक पहुंचा रही हैं। यहां बनने वाला हर मांडणा केवल रंगों और आकृतियों का मेल नहीं, बल्कि महिलाओं की मेहनत, रचनात्मकता, पारिवारिक परंपराओं और धार्मिक आस्था की कहानी भी बयां करता है।
दीपावली पर रोशनी और सजावट तो हर शहर में होती है, लेकिन रूप चतुर्दशी की रात डीडवाना के बाजारों में महिलाओं के हाथों से बनने वाले मांडणे इस शहर की दिवाली को एक अलग पहचान देते हैं। यह परंपरा बताती है कि संस्कृति की असली खूबसूरती उसकी विरासत को संभालकर रखने और अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में है।
डीडवाना की यह अनूठी परंपरा आज भी आस्था, संस्कृति और महिला सम्मान के रंगों से पूरे शहर को सराबोर कर रही है।

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