पक्की सड़क की आस में पथराई आंखें: चांदपुरा पंचायत की कच्ची सड़क बनी ग्रामीणों की सबसे बड़ी मुसीबत


कुचामन ब्लॉक की ग्राम पंचायत चांदपुरा के जोड़पुरा गांव और आसपास की दर्जनों ढाणियों के ग्रामीण वर्षों से जिस पक्की सड़क का इंतजार कर रहे हैं, वह इंतजार अब थकान और नाराज़गी में बदलता जा रहा है। जिलिया सड़क से जीलालिया टीब्बा होते हुए शिवदानपुरा सीमा तक जाने वाला यह मार्ग आज भी कच्चा और बदहाल है, जबकि यही रास्ता क्षेत्र का मुख्य संपर्क मार्ग माना जाता है।

ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में इस रास्ते से गुजरना किसी जोखिम से कम नहीं होता। जगह-जगह गड्ढे, खड़ंजे पर बढ़ती फिसलन और कीचड़ के कारण बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के गिरने की घटनाएं आम हो गई हैं। दोपहिया वाहन चालकों के लिए तो यह मार्ग हमेशा खतरे का सबब बना रहता है। इसके बावजूद वर्षों से मांग उठने के बाद भी सड़क निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो पाई है।

ग्रामीणों का दर्द यह है कि यह केवल एक गांव की समस्या नहीं, बल्कि चार से अधिक पंचायतों को जोड़ने वाली अहम सड़क है। इसके पक्कीकरण और चौड़ीकरण से जिलिया, दीपपुरा, शिव पंचायत सहित आसपास के गांवों के लोगों को आवागमन में बड़ी राहत मिल सकती है। बावजूद इसके प्रशासन और जनप्रतिनिधियों का ध्यान अब तक इस ओर नहीं गया है।

सामाजिक कार्यकर्ता, भगत सिंह यूथ ब्रिगेड के प्रदेशाध्यक्ष एवं विश्व जाट महासभा के प्रदेश उपाध्यक्ष परसाराम बुगालिया का कहना है कि कुचामन प्रखंड के कई ग्रामीण इलाकों में सड़कें या तो बेहद खराब हालत में हैं या फिर हैं ही नहीं। चांदपुरा पंचायत का जोड़पुरा गांव इसका ज्वलंत उदाहरण है। उन्होंने बताया कि यदि इस सड़क को आनंदपुरा से पांचवा घाटी चौराहा तक चौड़ा कर पक्का कर दिया जाए, तो यह कुचामन शहर के लिए एक वैकल्पिक बाइपास का रूप ले सकती है।

परसाराम बुगालिया के अनुसार इस मार्ग के विकसित होने से सीकर और दाता की ओर से डीडवाना, नागौर, जोधपुर, लाडनूं और सुजानगढ़ जाने वाले वाहनों को लंबा चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। इससे न केवल समय और ईंधन की बचत होगी, बल्कि कुचामन शहर में बढ़ते ट्रैफिक दबाव में भी कमी आएगी।

ग्रामीणों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने मीडिया के माध्यम से एक बार फिर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से इस सड़क के शीघ्र चौड़ीकरण और पक्कीकरण की मांग उठाई है। अब देखना यह है कि वर्षों से पक्की सड़क का सपना देख रहे ग्रामीणों की यह उम्मीद कब हकीकत में बदलती है, या फिर उनकी आंखें यूं ही सड़क की ओर टिकी रह जाएंगी।

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