“जब असलम रख सकते हैं रोजा, तो हम क्यों नहीं?” — स्वस्थ होकर भी रोजा नहीं रखने वाले लोगों के लिए आईना बने कुचामन सिटी के असलम टाक

कुचामन सिटी के गुलजारपुरा मोहल्ले से इन दिनों एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो यह साबित करती है कि इबादत के लिए जिस्म नहीं, जज़्बा चाहिए। जन्म से दिव्यांग असलम टाक रमजान के पाक महीने में जिस संकल्प और लगन के साथ रोजे रख रहे हैं, वह न सिर्फ मुस्लिम समाज बल्कि हर इंसान के लिए प्रेरणा बन गया है।

शारीरिक सीमाएं, लेकिन इरादा फौलादी

असलम टाक के दोनों हाथ और पैर पूरी तरह विकसित नहीं हैं। वे अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए परिवार पर निर्भर हैं, लेकिन इबादत के मामले में उनका हौसला किसी से कम नहीं। पूरे रमजान में वे नियमित रूप से रोजे रख रहे हैं और पांचों वक्त की नमाज के साथ तरावीह भी अदा कर रहे हैं।

नमाज का समय होते ही उनके परिजन उन्हें सहारा देकर मस्जिद तक ले जाते हैं। सामान्य रूप से बैठ पाना संभव नहीं होने के कारण वे मस्जिद में एक खंभे के सहारे बैठकर जमात के साथ नमाज अदा करते हैं। उनका यह दृश्य हर देखने वाले के दिल को छू जाता है।

स्वस्थ लोगों के लिए एक सवाल

असलम का यह जज़्बा उन लोगों के लिए भी एक आईना है, जो पूरी तरह स्वस्थ होने के बावजूद रोजे नहीं रख रहे। जहां कई लोग मामूली थकान, कामकाज या व्यस्तता का हवाला देकर रोजे से दूरी बना लेते हैं, वहीं असलम अपनी शारीरिक चुनौतियों के बावजूद पूरे सब्र और शुक्र के साथ इबादत में जुटे हुए हैं।

उनकी हालत मानो खामोशी से एक सवाल पूछती है—जब इतनी मजबूरियों के बावजूद रोजा रखा जा सकता है, तो सेहतमंद लोग क्यों पीछे रहें?

क्या कहते हैं असलम टाक?

जब इस बारे में असलम से बातचीत की गई तो उन्होंने बेहद सादगी और यकीन के साथ कहा,

“अल्लाह ने मुझे जैसा भी बनाया है, मैं उसी में खुश हूं। रोजा रखना और नमाज पढ़ना मेरे लिए नेमत है। अगर मैं अपनी हालत के बावजूद रोजा रख सकता हूं तो जो लोग तंदुरुस्त हैं, उन्हें तो जरूर रखना चाहिए। रमजान सब्र, शुक्र और अपने नफ्स पर काबू पाना सिखाता है।”

उनकी यह बात सीधे दिल में उतर जाती है। न शिकायत, न शिकवा—सिर्फ शुक्र और इबादत का जज़्बा।

संघर्षों से भरा जीवन, मगर हौसला बुलंद

असलम गुलजारपुरा निवासी अली मोहम्मद और खातून के पुत्र हैं। जब वे महज चार महीने के थे, तभी उनकी मां का इंतकाल हो गया। दादी और फिर मौसी ने उनकी परवरिश की जिम्मेदारी संभाली। इलाज के लिए कई प्रयास हुए, मगर स्थायी समाधान नहीं मिल सका।

वर्तमान में वे अपने ताऊ के पुत्र मोहम्मद इकबाल और उनकी पत्नी जरीना के साथ रह रहे हैं, जो पूरे समर्पण और प्रेम के साथ उनकी सेवा कर रहे हैं। परिवार के सहयोग और अपने अडिग विश्वास के सहारे असलम आज भी मुस्कुराते हुए जिंदगी जी रहे हैं।

एक इंसान नहीं, एक संदेश

असलम टाक की कहानी सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह विश्वास, सब्र और हौसले की ऐसी दास्तान है, जो हर स्वस्थ इंसान को अपने गिरेबान में झांकने पर मजबूर कर देती है।

रमजान की इस रूहानी फिजा में असलम का जज़्बा एक साफ संदेश देता है—अगर नीयत मजबूत हो तो कोई भी कमजोरी इबादत की राह में रुकावट नहीं बन सकती।

और शायद यही सबसे बड़ा सवाल है—

जब असलम रोजा रख सकते हैं, तो हम क्यों नहीं?

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