डीडवाना शहर इन दिनों दीपावली की रौनक में रंगा हुआ है। लेकिन इस रौनक की सबसे खास बात है — यहां की सदियों पुरानी “मांडणा प्रथा”, जो पूरे देश में अपनी तरह की एक अनोखी परंपरा मानी जाती है। इस परंपरा में दीपावली की पूर्व संध्या पर महिलाएं अपने घरों की बजाय बाजार के व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बाहर रंगोली बनाती हैं। यह परंपरा आज भी उसी श्रद्धा और जोश के साथ निभाई जाती है, जैसे कभी हमारे पूर्वजों के जमाने में होती थी।

सदियों पुरानी परंपरा जो बनी डीडवाना की पहचान
मांडणा प्रथा डीडवाना की पहचान है। यह कोई साधारण रस्म नहीं, बल्कि एक ऐसी परंपरा है जो आस्था, समृद्धि और समानता का प्रतीक मानी जाती है। दीपावली की पूर्व संध्या पर जब पूरा डीडवाना रोशनी से नहा उठता है, तो बाजारों में महिलाएं और युवतियां अपने हाथों से रंगोली बनाती दिखाई देती हैं। इन्हें यहां की स्थानीय भाषा में “मांडणा” कहा जाता है।
जानकारों के मुताबिक, इस प्रथा की शुरुआत सैकड़ों वर्ष पहले हुई थी जब व्यापारी वर्ग दीपावली से पहले अपने प्रतिष्ठानों के बाहर देवी लक्ष्मी के स्वागत में रंगोली बनवाते थे। धीरे-धीरे यह रस्म महिलाओं की सामाजिक भागीदारी का प्रतीक बन गई।

समाजसेवी और पूजा इंटरनेशनल एकेडमी के चेयरमैन बजरंग सिंह राठौड़ का कहना है कि “मांडणा परंपरा डीडवाना की आत्मा है। यह केवल सजावट नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति और मातृशक्ति के सम्मान की अभिव्यक्ति है। सदियों से महिलाएं इस परंपरा को निभा रही हैं और यह डीडवाना की पहचान बन चुकी है।”
महिलाओं के लिए परंपरा से जुड़ा विश्वास
डीडवाना की गलियों और बाजारों में इस दिन का दृश्य अद्भुत होता है। महिलाएं और युवतियां घरों से सज-धज कर निकलती हैं, अपने व्यापारिक प्रतिष्ठानों के बाहर मिट्टी के रंग, आटे और फूलों से सुंदर मांडणे बनाती हैं। उन्हें विश्वास है कि इन मांडणों से देवी लक्ष्मी प्रसन्न होती हैं और व्यापार में उन्नति होती है।

गृहणी सुनयना मोठ बताती हैं कि “बुजुर्गों के दौर से यह परंपरा चली आ रही है, हमने हमारी सास से इस बारे में जाना, और उन्होंने अपनी सास से । हर साल दीपावली से एक दिन पहले हम बाजार में जाकर अपने प्रतिष्ठानों पर मांडणा बनाते हैं। इससे सुख-समृद्धि आती है और लक्ष्मी माता की कृपा बनी रहती है।”
नीतू बगड़िया ने बताया कि “यह हमारे लिए केवल पूजा नहीं बल्कि सम्मान और विश्वास की बात है। जब पूरा बाजार रंगोली से भर जाता है, तो लगता है जैसे हमारी मेहनत से पूरा शहर जगमगा उठा हो।”
आस्था के साथ समाज में समानता का संदेश
यह परंपरा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। एक समय था जब महिलाओं की सार्वजनिक भागीदारी सीमित थी, लेकिन डीडवाना में यह परंपरा उन्हें समाज में बराबरी का दर्जा देने का प्रतीक बनी। महिलाएं इस दिन बाजार में जाकर अपनी कला प्रदर्शित करती हैं और देवी लक्ष्मी से सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

ममता, अनीता और बबीता जैसी गृहणियां कहती हैं कि यह परंपरा उन्हें उनकी सास और दादी से मिली धरोहर है। ममता कहती हैं — “हम हर साल इस दिन का इंतजार करते हैं। मांडणा बनाना सिर्फ रंग भरना नहीं, बल्कि घर और व्यापार की खुशहाली की कामना है।”
अनीता ने बताया कि “हमारी सास से यह परंपरा हमें मिली है, अब हम अपनी बेटियों को सिखा रहे हैं ताकि यह विरासत आगे भी चलती रहे।”
वहीं बबीता ने जानकारी देते हुए कहा कि “जब पूरा बाजार रोशनी और रंगों से सजता है, तब लगता है कि डीडवाना की दीपावली महिलाओं के हाथों से पूरी होती है।”
नगर परिषद ने दी परंपरा को नई पहचान
डीडवाना नगर परिषद भी इस परंपरा को जीवित रखने में अहम भूमिका निभा रही है। हर साल दीपावली की पूर्व संध्या पर नगर परिषद द्वारा शहर में महिलाओं द्वारा अपने अपने प्रतिष्ठानों के बाहर बनाए गए मांडणा में से बेहतर का चुनाव किया जाता हैनर पुरस्कार से नवाजा जाता है । इस दिन बाजारों में मेला-सा माहौल होता है, बच्चे और बुजुर्ग रंग-बिरंगे मांडणों को देखने के लिए उमड़ पड़ते हैं।

नगर परिषद आयुक्त भगवान सिंह का कहना है कि “डीडवाना की यह मांडणा परंपरा हमारी सांस्कृतिक धरोहर है। नगर परिषद हर साल महिलाओं की इस कला को सम्मान देती है। यह न केवल हमारी संस्कृति को संजोए रखती है, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बनती है।
डीडवाना की दीपावली — जब रंगों से लिखी जाती है परंपरा की कहानी
दीपावली की पूर्व संध्या पर डीडवाना के बाजारों में रंगोली की यह परंपरा न सिर्फ आस्था का प्रतीक है, बल्कि यह बताती है कि समाज में महिलाओं की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है। महिलाएं इस दिन अपनी कला से न केवल लक्ष्मी का स्वागत करती हैं, बल्कि नारी शक्ति, समानता और संस्कृति की अमिट छाप भी छोड़ती हैं।

भाजपा नेता श्याम प्रताप सिंह ने कहा कि “मांडणा प्रथा उस दौर में शुरू हुई थी जब महिलाओं का घर से बाहर निकलना असामान्य माना जाता था। उस समय भी डीडवाना ने महिलाओं को बाजार में स्थान देकर नारी सशक्तिकरण का उदाहरण पेश किया था। यह हमारे समाज की प्रगतिशील सोच को दर्शाती है।”
कुल मिलाकर, यह परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि डीडवाना की पहचान है —
जहाँ दीपावली की शुरुआत महिलाओं के हाथों से होती है और रंगों की खुशबू पूरे शहर में फैल जाती है।
