गर्म चाय के साथ घुलता जहर: डिस्पोजेबल कप बना सेहत और पर्यावरण का छिपा खतरा

डीडवाना – कुचामन , एक हाथ में चाय का कप और दूसरे में जल्दबाज़ी—शहर की भागती जिंदगी में यह आम दृश्य है, लेकिन इसी साधारण दिखने वाले डिस्पोजेबल कप के साथ हर घूंट में एक अनदेखा खतरा भी शरीर में प्रवेश कर रहा है। सुविधा के नाम पर तेजी से बढ़ा यह चलन अब वैज्ञानिक और चिकित्सकीय नजरिए से गंभीर चिंता का विषय बन चुका है।

शहर के गली-मोहल्लों, बस स्टैंड और बाजारों में बड़े पैमाने पर प्लास्टिक कोटिंग वाले पेपर कप में गर्म चाय परोसी जा रही है। विशेषज्ञों के अनुसार इन कपों के अंदर मौजूद पॉलीएथिलीन (Plastic Coating) की पतली परत गर्म चाय (70–90°C) के संपर्क में आकर टूटने लगती है, जिससे माइक्रोप्लास्टिक कण और अन्य रासायनिक तत्व चाय में घुल सकते हैं। शोध बताते हैं कि एक कप गर्म पेय में हजारों सूक्ष्म प्लास्टिक कण निकल सकते हैं, जो शरीर में जाकर धीरे-धीरे जमा होते हैं।

स्वास्थ्य पर असर: धीरे-धीरे बढ़ती समस्या

कुचामन राजकीय जिला चिकित्सालय के चिकित्सक डॉ. गौरव राजावत के अनुसार, लगातार ऐसे कपों में गर्म पेय लेने से माइक्रोप्लास्टिक शरीर में प्रवेश करता है, जो पाचन तंत्र, लीवर और हार्मोन सिस्टम को प्रभावित कर सकता है। इसके असर तुरंत नहीं दिखते, लेकिन लंबे समय में गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।

महिलाओं के स्वास्थ्य पर विशेष खतरा

मशहूर स्त्री रोग विशेषज्ञ वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. ओ.पी. बिशु का कहना है, की प्लास्टिक से निकलने वाले कुछ रसायन शरीर के हार्मोनल संतुलन को प्रभावित करते हैं। महिलाओं में यह समस्या ज्यादा संवेदनशील होती है, जिससे पीरियड्स अनियमित होना, फर्टिलिटी पर असर पड़ना और गर्भावस्था से जुड़ी जटिलताएं बढ़ सकती हैं। इसलिए महिलाओं को विशेष रूप से ऐसे डिस्पोजेबल कप में गर्म पेय लेने से बचना चाहिए।

पर्यावरण पर भी गंभीर असर

मशहूर रेडियोलॉजिस्ट और पर्यावरणविद डॉ. प्रदीप चौधरी के अनुसार, ये कप कागज के दिखते जरूर हैं, लेकिन प्लास्टिक कोटिंग के कारण न तो आसानी से नष्ट होते हैं और न ही रिसाइकिल हो पाते हैं। समय के साथ ये माइक्रोप्लास्टिक बनकर मिट्टी और पानी में घुल जाते हैं, जो अंततः हमारी खाद्य श्रृंखला में वापस आ जाते हैं।

सुविधा बनाम जिम्मेदारी

स्थानीय स्तर पर सस्ते और आसान विकल्प होने के कारण दुकानदार इन कपों का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं। लेकिन यह सुविधा अब सेहत और पर्यावरण दोनों पर भारी पड़ रही है। किसान नेता परसाराम बुगालिया ने इसे “धीमा जहर” बताते हुए लोगों से इस आदत को बदलने की अपील की है। उन्होंने कहा कि सुविधा के नाम पर हम अपनी सेहत और पर्यावरण दोनों से समझौता कर रहे हैं। कुल्हड़ न केवल सुरक्षित हैं बल्कि पर्यावरण के अनुकूल भी हैं और इससे स्थानीय कुम्हारों को रोजगार भी मिलता है। या फिर हमे कांच से बने बर्तन प्रयोग में लेने चाहिए ,जिन्हें बार बार उपयोग में लिया जा सकता है । 

समाधान जागरूकता में

विशेषज्ञों का मानना है कि इस बढ़ते खतरे को रोकने के लिए जागरूकता सबसे बड़ा हथियार है। प्रशासन और आमजन दोनों को मिलकर इस दिशा में कदम उठाने होंगे।

जरूरी है कि  डिस्पोजेबल कप का उपयोग कम से कम किया जाए  और सुरक्षित, पुन: उपयोग में आने वाले विकल्प अपनाएं जाएं , ताकि सेहत और पर्यावरण दोनों की रक्षा की जा सके।

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