भाद्रपद मास की द्वादशी तिथि पर मनाया जाने वाला बछ बारस का पर्व बुधवार को जिलेभर में श्रद्धा व उल्लास के साथ संपन्न हुआ। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार इस दिन महिलाएं गौ माता व बछड़े की पूजा कर अपने पुत्र की लंबी उम्र, स्वस्थ जीवन और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।

सुबह से ही कस्बे व ग्रामीण अंचलों में महिलाओं की भीड़ गाय व बछड़े की पूजा-अर्चना करने के लिए एकत्रित हुई। मंगल गीतों के साथ महिलाओं ने गाय व बछड़े के माथे पर तिलक लगाकर, चूनरी ओढ़ाकर विधिवत पूजा की। मोहल्लों में घरों के आगे महिलाओं ने गोबर से सुंदर तलाई बनाई, उसमें पानी व दूध भरकर दीपक जलाए और बछ बारस की कथा का श्रवण किया।

परंपरागत नियमों का पालन
स्थानीय महिलाओं अनिता शर्मा, गुंजन मूंदड़ा, ललिता वर्मा पारीक व पुष्पा गौड़ ने बताया कि बछ बारस पर विशेष परंपराओं का पालन किया जाता है। इस दिन गौ माता के दूध से बने उत्पादों का उपयोग नहीं किया जाता, साथ ही गेहूं से बनी वस्तुएं व चाकू से कटी सब्जियों को भी वर्जित माना जाता है। इसके स्थान पर महिलाएं बाजरा व मक्का से बने पकवान, अंकुरित चना-मूंग-मोठ की सब्जी और ज्वार-बाजरे का सोगरा बनाती हैं। पूजा के उपरांत इन व्यंजनों का प्रसाद परिवारजनों के साथ ग्रहण किया जाता है।

माताओं की मंगलकामना
पार्वती जोशी ने बताया कि इस दिन माताएं अपने पुत्रों को तिलक लगाकर तलाई फोड़ने की रस्म निभाती हैं और लड्डू का प्रसाद देती हैं। सुहागिन महिलाओं ने व्रत रखकर सामूहिक रूप से बछ बारस पर्व को हर्षोल्लास से मनाया। गाय-बछड़े की पूजा के साथ माताओं ने अपने पुत्र की दीर्घायु और मंगलमय जीवन की कामना की।

धार्मिक महत्व
पंडित नवरत्न शर्मा ने जानकारी दी कि भाद्रपद मास की द्वादशी को मनाया जाने वाला यह पर्व गोवत्स द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन गौ व बछड़े की पूजा करने से घर में सुख-शांति बनी रहती है और संतान के जीवन में आयु, स्वास्थ्य व समृद्धि की वृद्धि होती है।
बछ बारस के मौके पर डीडवाना-कुचामन जिले के शहरी व ग्रामीण क्षेत्रों में उत्सव जैसा माहौल रहा। महिलाओं के गीत, सामूहिक पूजा और परंपरागत व्यंजनों की सुगंध से पूरा वातावरण धार्मिक आस्था और उल्लास से सराबोर हो उठा।
