विशाल कलश यात्रा के साथ श्रीमद्भागवत कथा सप्ताह का शुभारम्भ, जगह-जगह हुई पुष्पवर्षा, श्रद्धालुओं का उमड़ा जनसैलाब

कुचामन सिटी में पारीक कॉलोनी स्थित शाहजी का बालाजी मंदिर परिसर में रविवार को संगीतमयी श्रीमद्भागवत कथा ज्ञान यज्ञ सप्ताह का शुभारम्भ भक्ति और उल्लास के माहौल में हुआ। कथा से पूर्व निकाली गई विशाल कलश यात्रा ने पूरे नगर का वातावरण भक्तिमय बना दिया। कुचामन गौशाला से प्रारम्भ हुई यह यात्रा बैण्ड-बाजों की सुमधुर धुनों और जगह-जगह हुई पुष्पवर्षा के बीच आयोजन स्थल तक पहुँची, जहाँ श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बन रहा था।

कलश यात्रा में सिर पर पीले-लाल वस्त्रों में सजी महिलाओं ने भागवत जी को धारण कर नृत्य करते हुए भक्ति रस की छटा बिखेरी, वहीं श्वेत वस्त्रधारी पुरुषों ने शोभायात्रा की गरिमा बढ़ाई। मुख्य यजमान चुन्नीलाल कुमावत ने भागवत जी सिर पर धारण कर यात्रा में अग्रणी भूमिका निभाई। आयोजन स्थल पहुँचकर महिलाओं ने विधिवत कलश स्थापित किए।

इस मौके पर चुन्नीलाल कुमावत, भंवरलाल पारीक, दिनेश शर्मा, बृजकिशोर शर्मा, बजरंगसिंह राजपुरोहित, राजाराम प्रजापत, धन्नाराम जाखड़, त्रिलोक कुमावत, मधुसूदन पारीक, बजरंगलाल कुमावत, लेखराज कुमावत, अशोक मोर, प्यारेलाल कुमावत, रूपसिंह राजपुरोहित, गोपाल कुमावत, महेन्द्रसिंह चारण, पृथ्वीसिंह राठौड़, श्रवणसिंह कांकरिया, लुकुटबल्लभ गौड़, पवन शर्मा उर्फ भोमजी, बिहारीलाल सोनी, सुमेरसिंह पलाड़ा वाले, दिनेश गौड़, अखिलेश रॉय, सुरेश पारीक खारिया वाले, बाबुलाल कुमावत कम्पाउण्डर, मनोहर पारीक, संजय पारीक, किशनलाल गुर्जर, गिरधारी कुमावत, पूर्व पार्षद नेमीचंद कुमावत, मनोज कुमावत, सुरेश कुमार, अर्जुनराम चौधरी, बजरंगलाल पारीक सहित बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन एवं धर्मप्रेमी उपस्थित रहे।

भगवान का वाङ्गमय स्वरूप है भागवत कथा


व्यासपीठ पर विराजमान विपिन बिहारी शरण महाराज ने प्रथम दिवस श्रद्धालुओं को भागवत महात्म्य का रसामृतपान कराया। उन्होंने कहा कि श्रीमद्भागवत केवल एक ग्रंथ नहीं बल्कि भगवान श्रीकृष्ण का वाङ्गमय स्वरूप है। इसके श्रवण मात्र से मानव जन्म-जन्मान्तर के कष्टों से मुक्त होकर प्रभु के धाम का अधिकारी बन जाता है।

महाराज ने कहा कि स्वर्ग केवल कर्मों का फल देता है और जीव पुनः आवागमन में बंध जाता है, लेकिन मोक्ष प्राप्त करने पर ही इस चक्र से पूर्ण मुक्ति मिलती है। मोक्ष की प्राप्ति के लिए सत्संग अनिवार्य है और सत्संग केवल प्रभु की कृपा से संभव है।

उन्होंने कथा को भक्ति, ज्ञान, वैराग्य और सद्विचार प्रदान करने वाली बताते हुए कई प्रसंग सुनाए। शुकदेव मुनि और अमृत कलश का प्रसंग हो या महर्षि नारद द्वारा भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की रक्षा की कथा – हर प्रसंग पर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो उठे।

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